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मासिक धर्म वाली औरतों से अयप्पा को इसलिए होती है परेशानी

सबरीमाला का मंदिर केरल में है। इस मंदिर में दस से 50 साल तक की महिलाएं पर प्रतिबंध है। इस उम्र की महिलाएं जो मासिक चक्र की स्थिति में हैं। वे अयप्पा के दर्शन नही कर सकतीं। इसके पीछे एक मान्यता है। इस मंदिर के मुख्य देवता अयप्पा ब्रह्मचारी थे। ऐसे में उनका ध्यान भंग हो सकता है।

यहां सिर्फ छोटी बच्चियां और बूढ़ी महिलाएं ही प्रवेश कर सकती हैं। सबरीमाला मंदिर में हर साल नवम्बर से जनवरी तक, श्रद्धालु आते हैं। अयप्पा भगवान के दर्शन करते हैं। शेष पूरे साल यह मंदिर आम भक्तों के लिए बंद रहता है। भगवान अयप्पा के भक्तों के लिए मकर संक्रांति विशिष्ट होती है। इस दिन यहां सबसे ज़्यादा भक्त पहुंचते हैं। सुप्रीम कोर्ट से इतर आया था केरल हाईकोर्ट का फैसला।

केरल हाई कोर्ट ने दो बार,साल 1991 और 2015 में कहा था कि सबरीमला मंदिर को अपनी परंपराएं जारी रखने का अधिकार है। इसके पीछे तर्क था। तर्क ये कि मासिक चक्र वाली महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को लेकर लगी पाबंदी के आशय अलग हैं। ये आयु पर आधारित है। महिलाओं को वर्ग नही माना गया है। मगर केरल सरकार ने तर्क दिया कि महिलाओं के एक वर्ग को प्रवेश देने से मना करना उचित नही है।

सबरी माला को लेकर पौराणिक कथा है। अयप्पा को भगवान शिव और मोहिनी का पुत्र माना जाता है। इनका एक नाम हरिहरपुत्र भी है। हरि यानी भगवान विष्णु और हर यानी भगवान शिव। दोनों भगवानों के नाम पर हरिहरपुत्र नाम पड़ा। सबरीमाला को दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है।

यह मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित है। यहां आने की भी विशिष्ट परंपरा है। यहां श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं। इस पोटली में भगवान को चढ़ाई जानी वाली सामग्री होती है। यहां मान्यता है कि इन परंपराओं के साथ जो आता है,उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर। व्रत रखकर। सिर पर नैवेद्य की पोटली रखकर।

इससे पहले याचिकाकर्ता ‘द इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन’ ने सबरीमाला स्थित भगवान अयप्पा के इस मंदिर की इस परंपरा को चुनौती दी थी। 800 साल से महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को गलत बताया था।

केरल सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि  वह मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के हक में है।

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