राष्ट्रीय विशेष

वो तो आदि शंकराचार्य थे। फिर एक महिला से कैसे हार गए?

ये भी हुआ भारत के इतिहास में। दर्शन और शास्त्र का प्रकांड ज्ञाता एक महिला के आगे शांत हो गया। ये महान ज्ञाता थे आदि शंकराचार्य और महिला थीं उभय भारती। भारतीय धर्म-दर्शन के शिखर पर आसीन आदि शंकराचार्य एक सामान्य पर बुद्धिमान महिला के आगे चुप थे।

भारती के पति मंडन मिश्र मिथिलांचल में निवास करते थे। धर्म-दर्शन के क्षेत्र में शंकराचार्य की ख्याति दूर-दूर तक थी। शंकराचार्य का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण के यहां हुआ। मात्र 32 वर्ष की उम्र में वे निर्वाण प्राप्त कर ब्रह्मलोक चले गए।

इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने भारतभर का भ्रमण किया। हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की। चार मठ के शंकराचार्य ही हिंदुओं के केंद्रिय आचार्य माने जाते हैं,

शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराते आए थे। वे मंडन मिश्र के गांव तक पहुंचे थे। यहां 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ हुआ। शंकराचार्य ने हालांकि मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए। वो एक सवाल बेहद अहम था। वो यक्ष प्रश्न की तरह था। शंकराचार्य ने उसका अनुभव कभी नही किया था।

मंडन मिश्र गृहस्थ आश्रम में रहने वाले विद्वान थे। उनकी पत्नी भी विदुषी थीं। शंकराचार्य जानते थे कि मंडन मिश्र की पत्नी भारती विद्वान हैं। उन्होंने उन्हें ही निर्णायक की भूमिका निभाने को कहा। इस कहानी की तह में जाने से पहले शंकराचार्य के दर्शन पर भी ध्यान देना होगा।  शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि ‘ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’ आत्मा की गति मोक्ष में है।

वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है। यही जीवन का सार है।

अब शास्त्रार्थ की बात। मंडन और शंकराचार्य के बीच 21 दिनों तक शास्त्रार्थ होता रहा। आखिर में शंकराचार्य के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और उन्हें पराजय स्वीकार करनी पड़ी। शंकराचार्य ने उन्हें शिष्य बनने और संन्यास की दीक्षा लेने को कहा। लेकिन भारती ने कहा कि मैं उनकी पत्नी हूं। मेरी हार नही हुई है। आप पहले मेरे साथ शास्त्रार्थ करें। भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ की चुनौती दी।

शंकराचार्य और भारती के बीच भी कई दिनों तक शास्त्रार्थ होता रहा। 21वें दिन भारती को यह लगने लगा कि अब उनकी हार तय है।21वें दिन भारती ने एक ऐसा सवाल कर दिया, जिसका शंकराचार्य के पास कोई जवाब नही था।

भारती ने शंकराचार्य पूछा- काम क्या है? इसकी प्रक्रिया क्या है और इससे संतान की उत्पत्ति कैसे होती है? आदि शंकराचार्य तुरंत सवाल की गहराई समझ गए। यदि वे उस वक्त इसका जवाब देने की स्थिति में नहीं थे, क्योंकि वे ब्रह्मचारी थे।

यद्यपि मंडन मिश्र ने भारती को टोका भी कि एक ब्रहमचारी से कैसे सवाल कर रही हो। पर भारती अडिग रहीं। ऐसे में शंकराचार्य ने भारती से जवाब के लिए छह माह का समय मांगा। शंकराचार्य इस हार के बाद वहां से चले गए।

कहा जाता है कि इस सवाल का जवाब जानने के लिए शंकराचार्य ने योग के जरिए शरीर त्याग कर एक मृत राजा की देह में प्रवेश किया। यह राजा अमरूक की देह थी। । राजा के शरीर में प्रविष्ट होकर उसकी पत्नी के साथ रति क्रिया की। भारती के सवाल का जवाब ढूंढा। इसके बाद उन्होंने फिर भारती से शास्त्रार्थ कर उनके सवाल का जवाब दिया और उन्हें पराजित किया।

इसके बाद मंडन मिश्र और भारती दोनो ही उनके शिष्य बन गए।

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